₹25,095 करोड़ की साइबर ठगी रोकी: e-Zero FIR से तेज होगी कार्रवाई

लेकिन क्या इससे खत्म होगी ऑनलाइन धोखाधड़ी?

डिजिटल भुगतान और ऑनलाइन बैंकिंग ने देश की अर्थव्यवस्था को नई रफ्तार दी है, लेकिन इसी तेजी के साथ साइबर अपराध भी रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गए हैं। ऐसे माहौल में केंद्र सरकार का यह दावा कि समय रहते कार्रवाई कर ₹25,095 करोड़ की संभावित साइबर ठगी रोकी गई, केवल एक प्रशासनिक उपलब्धि नहीं बल्कि करोड़ों डिजिटल उपभोक्ताओं और निवेशकों के लिए राहत की खबर है। यह जानकारी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समक्ष केंद्रीय मंत्रालयों के सचिवों की बैठक में पहली बार विस्तार से रखी गई। इसके साथ ही e-Zero FIR प्रणाली, संदिग्ध खातों पर कार्रवाई और बैंकों के साथ बेहतर समन्वय जैसी कई पहल सामने आईं। ऐसे समय में जब लगभग हर निवेशक, बैंक ग्राहक और यूपीआई उपयोगकर्ता डिजिटल माध्यमों पर निर्भर है, यह पहल वित्तीय सुरक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। बाजार की नजर से देखें तो साइबर सुरक्षा केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं रह गई है। बैंकिंग, फिनटेक, डिजिटल भुगतान और ऑनलाइन निवेश से जुड़ी कंपनियों के लिए मजबूत सुरक्षा ढांचा भरोसे का आधार बनता है। यही वजह है कि इस दिशा में उठाया गया हर कदम पूरे डिजिटल वित्तीय तंत्र पर सकारात्मक असर डाल सकता है।
आखिर पूरा मामला क्या है?
गृह मंत्रालय ने सरकार को बताया कि 2021 से मई 2026 के बीच देश में साइबर अपराधों से ₹64,447 करोड़ की वित्तीय हानि दर्ज की गई। हालांकि इसी अवधि में त्वरित कार्रवाई के जरिए ₹25,095 करोड़ की संभावित धोखाधड़ी को रोका गया। कार्रवाई के दौरान 2.27 करोड़ संदिग्ध लेनदेन रोक दिए गए, 12.1 लाख म्यूल बैंक खातों (ऐसे खाते जिनका इस्तेमाल अपराधियों द्वारा धन छिपाने या स्थानांतरित करने के लिए किया जाता है) को डेबिट फ्रीज किया गया और 31.6 लाख संदिग्ध पहचान संकेतकों को राष्ट्रीय संदिग्ध रजिस्ट्री में चिह्नित किया गया। यहीं से कहानी दिलचस्प हो जाती है। इतनी बड़ी कार्रवाई के बावजूद साइबर अपराध पूरी तरह थमते नहीं दिख रहे हैं।
e-Zero FIR प्रणाली क्यों बनी बड़ी पहल?
सरकार ने पिछले वर्ष e-Zero FIR व्यवस्था शुरू की थी ताकि बड़े साइबर वित्तीय अपराधों में पुलिस कार्रवाई तुरंत शुरू हो सके। इस व्यवस्था के तहत यदि कोई व्यक्ति राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल (NCRP) या 1930 हेल्पलाइन पर शिकायत दर्ज कराता है और नुकसान ₹10 लाख से अधिक है, तो शिकायत स्वतः जीरो एफआईआर में बदल जाती है। सरल शब्दों में समझें तो जीरो एफआईआर का मतलब है कि घटना किसी भी क्षेत्र में हुई हो, शिकायत तुरंत दर्ज होकर जांच शुरू हो सकती है। बाद में मामला संबंधित थाने को भेजा जाता है। इससे शुरुआती घंटों में अपराधियों के खातों तक पहुंचना आसान हो जाता है।
शिकायतें लाखों, लेकिन FIR बेहद कम अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि शिकायतें इतनी अधिक हैं तो कानूनी कार्रवाई इतनी कम क्यों होती है?
सरकारी आंकड़ों के अनुसार अगस्त 2019 से मई 2026 तक लगभग 98 लाख साइबर अपराध शिकायतें दर्ज हुईं। लेकिन इनमें केवल 2.3 लाख एफआईआर दर्ज की गईं। यानी शिकायतों के मुकाबले एफआईआर का अनुपात सिर्फ 2.36% रहा। यही आंकड़ा बताता है कि साइबर अपराध से लड़ाई केवल तकनीक की नहीं बल्कि जांच प्रक्रिया, संसाधनों और राज्यों के बीच बेहतर समन्वय की भी है। सरकार को उम्मीद है कि e-Zero FIR इस अंतर को कम करने में मदद करेगा। बैंकिंग प्रणाली को कैसे किया जा रहा है मजबूत? साइबर अपराध में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका समय की होती है। यदि संदिग्ध खाते जल्दी चिन्हित हो जाएं तो धन वापस मिलने की संभावना बढ़ जाती है। इसी उद्देश्य से 1,596 बैंक और वित्तीय संस्थानों को राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल के सिटिजन फाइनेंशियल साइबर फ्रॉड रिपोर्टिंग एंड मैनेजमेंट सिस्टम से जोड़ा जा चुका है। इस नेटवर्क के जरिए बैंक, जांच एजेंसियां और कानून प्रवर्तन संस्थाएं तेजी से जानकारी साझा कर सकती हैं। इससे संदिग्ध लेनदेन रोकने और खातों को फ्रीज करने की प्रक्रिया पहले की तुलना में कहीं अधिक तेज हो सकती है।
पैसा फ्रीज हुआ, लेकिन वापसी की रफ्तार क्यों धीमी?
हालांकि तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। सरकार ने ₹10,718 करोड़ की राशि विभिन्न मामलों में फ्रीज कर दी है, लेकिन अब तक पीड़ितों को केवल ₹323 करोड़ ही वापस मिल सके हैं। यह अंतर बताता है कि धन रोक लेना और उसे कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद वास्तविक पीड़ित तक पहुंचाना दो अलग-अलग चरण हैं। कई मामलों में जांच, न्यायिक प्रक्रिया, कई राज्यों की एजेंसियों का समन्वय और बैंकिंग औपचारिकताएं समय लेती हैं। यही वजह है कि निवेशकों और आम नागरिकों के लिए केवल शिकायत दर्ज करना ही नहीं, बल्कि तुरंत रिपोर्ट करना भी बेहद जरूरी हो जाता है।
सरकार की डिजिटल सुरक्षा रणनीति कितनी व्यापक है?
गृह मंत्रालय ने पिछले पांच वर्षों में 2.75 लाख यूआरएल, 233 मोबाइल ऐप और 3,691 वेबसाइटों पर कार्रवाई की है। इन पर देश की संप्रभुता और सुरक्षा के खिलाफ सामग्री या साइबर अपराध से जुड़ी गतिविधियों का आरोप था। अब सरकार अगले चरण में राज्य और क्षेत्रीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र स्थापित करने, पुलिसकर्मियों को विशेष साइबर कमांडो के रूप में प्रशिक्षित करने तथा बैंकों और जांच एजेंसियों के बीच डेटा साझाकरण को और मजबूत करने की योजना पर काम कर रही है।
निवेशकों और आम नागरिकों को अब किस बात पर नजर रखनी चाहिए?
डिजिटल निवेश, यूपीआई भुगतान, इंटरनेट बैंकिंग और ऑनलाइन ट्रेडिंग तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में साइबर सुरक्षा अब केवल तकनीकी विषय नहीं बल्कि वित्तीय सुरक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है। विशेषज्ञ मानते हैं कि मजबूत साइबर ढांचा बैंकिंग प्रणाली में भरोसा बढ़ाएगा। वहीं दूसरी ओर अपराधी लगातार नए तरीके अपना रहे हैं। इसलिए केवल सरकारी तंत्र पर निर्भर रहने के बजाय निवेशकों और ग्राहकों को भी दो-स्तरीय प्रमाणीकरण, मजबूत पासवर्ड, संदिग्ध लिंक से दूरी और तुरंत शिकायत दर्ज करने जैसी सावधानियां अपनानी होंगी।
निष्कर्ष
सरकार का दावा कि ₹25,095 करोड़ की संभावित साइबर ठगी रोकी गई, डिजिटल अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक संकेत है। e-Zero FIR जैसी पहल भविष्य में बड़े वित्तीय अपराधों पर तेजी से कार्रवाई का रास्ता खोल सकती है। लेकिन केवल ₹323 करोड़ की धनवापसी यह भी दिखाती है कि पीड़ितों तक पैसा पहुंचाने की प्रक्रिया अभी लंबी और जटिल है। निवेशकों के लिए सबसे बड़ा अवसर एक अधिक सुरक्षित डिजिटल वित्तीय तंत्र का निर्माण है, जबकि सबसे बड़ा जोखिम साइबर अपराधियों के लगातार बदलते तरीके हैं। आगे 19 और राज्यों में e-Zero FIR का विस्तार, बैंकों के साथ बढ़ता समन्वय और साइबर कमांडो जैसी योजनाओं की प्रगति पर बाजार, वित्तीय संस्थानों और आम नागरिकों सभी की नजर रहेगी।